भवति शिशुजनो वयोऽनुरोधाद्
संस्कृत श्लोक
भवति शिशुजनो वयोऽनुरोधाद् गुणमहतामपि लालनीय एव। व्रजति हिमकरोऽपि बालभावात् पशुपति-मस्तक-केतकच्छदत्वम्॥
रोमन लिप्यन्तरण
Roman transliteration of the Shloka
bhavati śiśujano vayo’nurodhād
guṇamahatāmapi lālanīya eva|
vrajati himakaro’pi bālabhāvāt
paśupati-mastaka-ketakacchadatvam||
श्लोक का पदविभाग
भवति शिशुजनः वयोऽनुरोधात्
गुण-महताम् अपि लालनीयः एव।
व्रजति हिमकरः अपि बालभावात्
पशुपति-मस्तक-केतकच्छदत्वम्॥
श्लोक का शब्दार्थ
- भवति – होता है।
- शिशुजनः – बालकः। कोई छोटा बच्चा
- वयोऽनुरोधात् – आयु/उम्र की वजह से
- गुण-महताम् – गुणों से बड़े लोगों के (लिए)
- अपि – भी
- लालनीयः – लाड, प्यार के योग्य
- एव – ही
- व्रजति – चला जाता है, पहुंचता है
- हिमकरः – चन्द्रमा
- अपि – भी
- बालभावात् – बालकता, बालकत्व की वजह से
- पशुपति-मस्तक-केतकच्छदत्वम् – शंकरजी के सिर पर केतकी के फूल समान स्थिति को
अन्वय
शिशुजनः वयोऽनुरोधात् गुण-महताम् अपि लालनीयः एव भवति। (यथा) हिमकरः अपि पशुपति-मस्तक-केतकच्छदत्वम् बालभावात्
व्रजति॥
हिन्दी अनुवाद
कोई बालक अपनी उम्र की वजह से बड़े गुणी लोगों के लिए भी लाड़-प्यार के योग्य होता है। जैसे चन्द्रमा भी भगवान् शंकर के मस्तक पर केतकी के फूल के समान अपने बालस्वभाव की वजह से प्राप्त होता है।
यह श्लोक संस्कृत कवि दिङ्नाग के नाटक कुन्दमाला से लिया गया है। और इसी नाटक का एक अंश कक्षा दशमी के संस्कृत पाठ्यपुस्तक में पाठ (शिशुलालनम्) के रूप में छात्रों के पढ़ने के लिए है। उस पाठ को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें –
https://kakshakaumudi.com/शिशुलालनम्-कक्षा-10-शेमुषी-cbse/
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